अगले 5 साल में अंतरिक्ष में छिड़ सकती है जंग : चीन के 5 सैटेलाइट ने साथ किया अभ्यास; GPS से बैंकिंग तक पड़ सकता है असर
इंटरनेशनल डेस्क.
अब तक युद्ध की तस्वीर जमीन, समुद्र और आसमान तक सीमित रही है, लेकिन आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष भी सैन्य टकराव का नया मोर्चा बन सकता है। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि अमेरिका, चीन, रूस और ब्रिटेन जैसी ताकतें एक-दूसरे के सैटेलाइट को निशाना बनाने की क्षमता बढ़ा रही हैं। अगर अंतरिक्ष में हमला हुआ, तो उसका असर सिर्फ सेनाओं तक सीमित नहीं रहेगा। इंटरनेट, टीवी प्रसारण, मौसम की भविष्यवाणी, बैंकिंग और विमान-जहाजों की नेविगेशन सेवाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
अंतरिक्ष में सैटेलाइट अब केवल सूचना जुटाने या संचार का माध्यम नहीं हैं। आधुनिक सैन्य अभियानों में इनका इस्तेमाल निगरानी, लोकेशन पता करने और सेना के बीच संपर्क बनाए रखने के लिए भी होता है। ऐसे में किसी सैटेलाइट का नष्ट होना या उसके सिग्नल बाधित होना कई देशों की सुरक्षा और रोजमर्रा की सेवाओं के लिए चुनौती बन सकता है।

चीन के 5 सैटेलाइट ने एक साथ की गतिविधियां
अमेरिकी स्पेस फोर्स के मुताबिक, चीन के पांच सैटेलाइट ने अंतरिक्ष में एक-दूसरे के करीब आकर ऐसी गतिविधियां कीं, जिनका इस्तेमाल सैन्य अभियानों में किया जा सकता है। अंतरिक्ष में इस तरह की नजदीकी गतिविधियों को गंभीरता से देखा जा रहा है, क्योंकि इनके जरिए किसी दूसरे सैटेलाइट की निगरानी करने, उसके पास पहुंचने या उसकी कार्यक्षमता को प्रभावित करने की संभावनाएं बन सकती हैं।
चीन ऐसी तकनीक विकसित करने में भी जुटा है, जिससे अंतरिक्ष में मौजूद दूसरे सैटेलाइट को पकड़ा जा सके या उसकी कक्षा बदलने की कोशिश की जा सके। ऐसी क्षमताएं भविष्य में अंतरिक्ष सुरक्षा को लेकर देशों के बीच तनाव बढ़ा सकती हैं।
रूस के सैन्य सैटेलाइट भी निगरानी के दायरे में
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस के कुछ सैन्य सैटेलाइट दूसरे देशों के सैटेलाइट के करीब पहुंचकर उनकी निगरानी करते रहे हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने रूस के कॉसमॉस-2553 सैटेलाइट को लेकर भी चिंता जताई है। हालांकि, इस सैटेलाइट में परमाणु हथियार से जुड़े उपकरण होने के दावों को स्थापित तथ्य की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
अंतरिक्ष में किसी सैटेलाइट का दूसरे के करीब पहुंचना अपने आप में हमला नहीं माना जाता। लेकिन जब ऐसी गतिविधियां सैन्य क्षमता, निगरानी या संभावित हस्तक्षेप से जुड़ी हों, तो दूसरे देश उन्हें सुरक्षा के लिहाज से खतरे के रूप में देख सकते हैं।

अमेरिका ने 2019 में बनाई स्पेस फोर्स, ब्रिटेन ने भी बढ़ाई तैयारी
अंतरिक्ष में बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच अमेरिकाऔर ब्रिटेन अपनी तैयारियां मजबूत कर रहे हैं। अमेरिका ने 2019 में स्पेस फोर्स बनाई थी। इसकी जिम्मेदारियों में अमेरिकी अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा और अंतरिक्ष में दूसरे देशों की सैन्य गतिविधियों पर नजर रखना शामिल है।
ब्रिटेन की वायुसेना ने भी सितंबर में अपने सैटेलाइट की सुरक्षा के लिए एक यूनिट बनाई। इन कदमों से संकेत मिलता है कि प्रमुख देश अब अंतरिक्ष को राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा मान रहे हैं।
4 देश कर चुके हैं सैटेलाइट नष्ट करने वाली मिसाइलों का परीक्षण
अंतरिक्ष में सैन्य प्रतिस्पर्धा नई नहीं है। अमेरिका, चीन, भारत और रूस ऐसे परीक्षण कर चुके हैं, जिनमें मिसाइल से पृथ्वी की कक्षा में मौजूद सैटेलाइट को नष्ट किया गया।
चीन: 2007 में मिसाइल से अपना मौसम संबंधी सैटेलाइट नष्ट किया।
अमेरिका: 2008 में खराब जासूसी सैटेलाइट को मिसाइल से नष्ट किया।
भारत: 27 मार्च 2019 को ‘मिशन शक्ति’ के तहत एंटी-सैटेलाइट परीक्षण किया।
रूस: 15 नवंबर 2021 को मिसाइल से अपने पुराने सैटेलाइट को नष्ट किया।
ऐसे परीक्षणों से किसी देश की अंतरिक्ष में मौजूद वस्तुओं को निशाना बनाने की क्षमता का पता चलता है। हालांकि, सैटेलाइट को नष्ट करने से मलबा भी पैदा हो सकता है, जो दूसरी अंतरिक्ष परिसंपत्तियों के लिए खतरा बन सकता है।
GPS सिग्नल रोकने से लेकर नकली लोकेशन दिखाने तक खतरे
अंतरिक्ष में हमला जरूरी नहीं कि मिसाइल से ही किया जाए। सैटेलाइट आधारित सेवाओं को बाधित करने के कई तरीके हो सकते हैं।
1. GPS सिग्नल जाम करना: इसमें सैटेलाइट से आने वाले नेविगेशन सिग्नल को बाधित किया जाता है। इससे मोबाइल, विमान या जहाज को अपनी सही लोकेशन पता करने में परेशानी हो सकती है।
2. नकली लोकेशन दिखाना: इसे स्पूफिंग कहते हैं। इसमें नकली सिग्नल के जरिए किसी डिवाइस को गलत लोकेशन बताई जाती है। इससे जहाज, विमान या अन्य नेविगेशन सिस्टम गलत दिशा में जा सकते हैं।
3. सैटेलाइट के कंट्रोल सिस्टम पर साइबर हमला: सैटेलाइट को जमीन पर मौजूद नियंत्रण केंद्रों से संचालित किया जाता है। इन केंद्रों के कंप्यूटर नेटवर्क पर हमला होने से सैटेलाइट से संपर्क, डेटा की सुरक्षा या उसके संचालन पर असर पड़ सकता है।
इन तरीकों का इस्तेमाल सैन्य अभियानों में विरोधी देश की निगरानी और संचार क्षमता को कमजोर करने के लिए किया जा सकता है। नागरिक सेवाओं पर इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सी प्रणाली प्रभावित हुई है और उसके पास वैकल्पिक व्यवस्था कितनी मजबूत है।

सैटेलाइट पर निर्भर हैं रोजमर्रा की कई सेवाएं
सैटेलाइट पृथ्वी या किसी दूसरे खगोलीय पिंड की कक्षा में चक्कर लगाने वाली वस्तु होती है। कृत्रिम सैटेलाइट को रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष में स्थापित किया जाता है। इनका इस्तेमाल संचार, मौसम की जानकारी, पृथ्वी की निगरानी, नेविगेशन और सैन्य गतिविधियों में होता है।
दुनिया की पहली कृत्रिम सैटेलाइट ‘स्पुतनिक-1’ को सोवियत संघ ने 1957 में अंतरिक्ष में भेजा था। भारत का पहला सैटेलाइट ‘आर्यभट्ट’ था, जिसे 1975 में सोवियत संघ के रॉकेट से लॉन्च किया गया।
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