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31st October 2026

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भारत का अपना GPS और मजबूत हुआ; 1,500 किमी तक मिलेगी सटीक लोकेशन, स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक से लैस

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ISRO ने लॉन्च किया NVS-03 सैटेलाइट : भारत का अपना GPS और मजबूत हुआ; 1,500 किमी तक मिलेगी सटीक लोकेशन, स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक से लैस

News Affair Team

Sat, Oct 31, 2026

श्रीहरिकोटा.

भारत ने सैटेलाइट नेविगेशन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और कदम बढ़ाया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने शुक्रवार रात 11 बजकर 51 मिनट पर NVS-03 नेविगेशन सैटेलाइट को सफलतापूर्वक लॉन्च किया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से GSLV-F18 रॉकेट ने उड़ान भरी। करीब 18 मिनट 40 सेकंड बाद 2,232 किलोग्राम वजनी सैटेलाइट रॉकेट से अलग होकर जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में पहुंच गया।

यह सैटेलाइट भारत के अपने नेविगेशन सिस्टम NavIC को मजबूत करेगा। इसके जरिए भारत के पूरे भूभाग और देश की सीमा से करीब 1,500 किलोमीटर आगे तक लोकेशन, नेविगेशन और सटीक समय की जानकारी देने वाली सेवाओं को मजबूती मिलेगी। NVS-03 में स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक के साथ L1 बैंड की सुविधा भी दी गई है।

कारगिल युद्ध के बाद महसूस हुई थी अपने GPS की जरूरत

भारत के अपने नेविगेशन सिस्टम की जरूरत 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान और स्पष्ट हुई थी। उस समय भारत ने अमेरिका से सैन्य इस्तेमाल के लिए GPS से जुड़ी सटीक लोकेशन जानकारी मांगी थी, लेकिन उसे यह सुविधा नहीं मिली। इस अनुभव ने रणनीतिक जरूरतों के लिए विदेशी नेविगेशन सिस्टम पर निर्भरता कम करने का महत्व सामने रखा।

इसके बाद भारत ने अपना क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया। इसी प्रयास का नतीजा NavIC है, जिसे ISRO ने तैयार किया। इसका उद्देश्य भारत और आसपास के क्षेत्र में स्वतंत्र नेविगेशन सेवाएं उपलब्ध कराना है।

NavIC मिशन का तीसरा नई पीढ़ी का सैटेलाइट

NVS-03, NavIC की दूसरी पीढ़ी के सैटेलाइट्स की श्रृंखला का तीसरा उपग्रह है। इसका मकसद मौजूदा नेविगेशन सेवाओं की निरंतरता बनाए रखना और उनकी क्षमता बढ़ाना है।

इसमें स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक के साथ अन्य एटॉमिक क्लॉक भी लगाए गए हैं। इसके अलावा पहले से उपलब्ध L5 और S बैंड के साथ L1 सिग्नल भी जोड़ा गया है। इससे NavIC के सिग्नल को सपोर्ट करने वाले उपकरणों का दायरा बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

क्या है NavIC और कैसे करता है काम?

NavIC का पूरा नाम Navigation with Indian Constellation है। यह भारत का अपना क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम है। इसे पहले Indian Regional Navigation Satellite System (IRNSS) के नाम से जाना जाता था।

यह सिस्टम पृथ्वी की कक्षा में मौजूद सैटेलाइट्स की मदद से किसी स्थान की स्थिति, गति और समय की जानकारी उपलब्ध कराता है। इसकी सेवाएं भारत के पूरे भूभाग और सीमा से लगभग 1,500 किलोमीटर आगे तक के क्षेत्र के लिए तैयार की गई हैं।

NavIC के तहत दो तरह की सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। पहली, आम नागरिकों के लिए Standard Positioning Service और दूसरी, अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए Restricted Service।

NavIC सैटेलाइट्स की टाइमलाइन

इस तरह NVS-03 तक NavIC के लिए कुल 12 सैटेलाइट लॉन्च किए जा चुके हैं। इनमें IRNSS-1H का प्रक्षेपण असफल रहा था, जबकि NVS-02 तकनीकी समस्या के कारण नेविगेशन सेवा नहीं दे सका।

आम लोगों को क्या फायदा होगा?

NavIC का इस्तेमाल सिर्फ सेना या सरकारी एजेंसियों तक सीमित नहीं है। इसके बेहतर होने से आम नागरिकों और कई क्षेत्रों को भी फायदा मिल सकता है।

  • मोबाइल नेविगेशन: सपोर्ट करने वाले स्मार्टफोन और उपकरणों में लोकेशन की जानकारी उपलब्ध कराने में मदद।

  • ट्रांसपोर्ट: बस, टैक्सी और ट्रक की ट्रैकिंग और रूट मैनेजमेंट।

  • मछुआरे: समुद्र में अपनी लोकेशन और दिशा की जानकारी।

  • खेती: सटीक लोकेशन आधारित कृषि गतिविधियों में सहायता।

  • आपदा प्रबंधन: बाढ़, चक्रवात और अन्य आपदाओं के दौरान राहत एवं बचाव कार्यों में मदद।

  • विमान और जहाज: नेविगेशन सेवाओं को बेहतर बनाने में उपयोग।

  • बैंकिंग और बिजली: सटीक समय की जरूरत वाली सेवाओं को टाइमिंग सिग्नल उपलब्ध कराने में सहायता।

GPS और NavIC में क्या अंतर है?

GPS पूरी दुनिया में नेविगेशन सेवाएं देता है, जबकि NavIC का दायरा भारत और आसपास के क्षेत्र तक सीमित है। दोनों प्रणालियां एक साथ काम कर सकती हैं। NavIC का उद्देश्य GPS को पूरी तरह हटाना नहीं, बल्कि भारत को अपनी स्वतंत्र नेविगेशन क्षमता उपलब्ध कराना है।

क्या हर मोबाइल में काम करेगा NavIC?

नहीं। NavIC का इस्तेमाल करने के लिए मोबाइल या अन्य डिवाइस में संबंधित सिग्नल और फ्रीक्वेंसी बैंड को सपोर्ट करने वाला हार्डवेयर होना जरूरी है। इसलिए यह सुविधा हर स्मार्टफोन में उपलब्ध नहीं है।

जिन उपकरणों में NavIC का सपोर्ट है, वे GPS जैसे दूसरे नेविगेशन सिस्टम के साथ इसके सिग्नल का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। NVS-03 में L1 बैंड जुड़ने से भविष्य में इस तकनीक को अपनाने वाले उपकरणों का दायरा बढ़ने की संभावना है।

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