एक लड़की की ‘चाल’, जिसने दुनिया जीत ली : दिव्या देशमुख ने 5 साल की उम्र में पहली बाजी खेली; 19 साल में बनीं महिला वर्ल्ड चेस चैंपियन
फीचर डेस्क.
2025 की सुबह जब दुनिया शतरंज की सबसे बड़ी बाजी देख रही थी, एक भारतीय लड़की अपने मोहरों के साथ इतिहास लिख रही थी। दिव्या देशमुख, सिर्फ 19 साल की उम्र में FIDE महिला वर्ल्ड चेस चैंपियन बन गईं। एक छोटे से शहर की साधारण लड़की, जिसने अपने असाधारण जुनून से विश्व चैंपियनशिप तक का सफर तय किया।
यह कहानी सिर्फ एक ट्रॉफी जीतने की नहीं है, यह कहानी है एक सपने की, जो हर लड़की के दिल में पलता है, एक संघर्ष की जो हर मां-बाप के समर्थन से संभव होता है, और एक सफर की जो हर बार नई चुनौती के साथ और मजबूत होता जाता है।
मैच के बाद दिव्या ने कहा-
मैं अभी तक इस जीत पर यकीन नहीं कर पा रही हूं। इसमें ढलने के लिए मुझे थोड़ा समय चाहिए होगा। मुझे लगता है कि यह किस्मत से हुआ कि मुझे इस तरह से ग्रैंडमास्टर का खिताब मिला। इस टूर्नामेंट से पहले मेरे पास इस टूर्नामेंट को लेकर नियम की किताब तक नहीं थी। यह निश्चित रूप से बहुत मायने रखता है। हासिल करने के लिए बहुत कुछ है। मुझे उम्मीद है कि यह सिर्फ शुरुआत है।
बचपन की पहली चाल
नागपुर की गलियों में खेलती एक छोटी सी बच्ची, जिसके हाथों में गुड़िया की जगह शतरंज का बोर्ड था। दिव्या का जन्म 2005 में एक मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में हुआ। उनके पिता डॉ. संजय देशमुख एक डॉक्टर हैं और मां प्रीति देशमुख एक साधारण गृहिणी। पर उनका सोचने का तरीका साधारण नहीं था।
जब बाकी बच्चे मोबाइल में गेम्स खेल रहे थे, दिव्या अपने पिता के साथ शतरंज की बिसात पर खेलना सीख रही थीं। महज़ 5 साल की उम्र में, उन्होंने अपनी पहली बाजी खेली। और फिर वह खेल, उनकी दुनिया बन गया।
जब हर मोहरा संघर्ष से चलता है

शतरंज में जीतने के लिए हर मोहरे को सोच-समझकर चलाना होता है। और दिव्या का जीवन भी किसी शतरंज की बाजी से कम नहीं था। एक ओर स्कूल की पढ़ाई, दूसरी ओर रोज़ 5-6 घंटे की कठिन ट्रेनिंग। कई बार दूसरे बच्चों को खेलते देखना और खुद टेबल पर पसीना बहाना।
दिव्या ने कभी शिकायत नहीं की। उन्होंने खुद को हर मुकाबले के लिए तैयार किया, चाहे वो बोर्ड पर हो या ज़िंदगी में। हर टूर्नामेंट के लिए ट्रेवल, हर हार के बाद खुद को मोटिवेट करना, और हर जीत को अगले लक्ष्य की सीढ़ी बनाना – यही थी दिव्या की दिनचर्या।
मां का आशीर्वाद, पिता का संबल

हर सफल लड़की के पीछे एक परिवार होता है जो उसे गिरने नहीं देता। दिव्या के लिए उनकी मां एक साया थीं – हर जीत पर आंखों में आंसू और हर हार पर मुस्कान देती हुई। उनका खाना, उनकी नींद, उनकी पढ़ाई – सब कुछ इस मां ने अपने हिसाब से संभाला, ताकि बेटी सिर्फ सपनों की बिसात पर ध्यान दे सके।
पिता ने कभी यह नहीं कहा कि तुम लड़की हो, तुमसे नहीं होगा। उन्होंने हमेशा यही कहा –
तू शेरनी है, कोई भी राजा तुझसे बच नहीं पाएगा।
इंटरनेशनल मोहरे और पहली उड़ान
9 साल की उम्र में दिव्या ने भारत का प्रतिनिधित्व करना शुरू किया। उनकी पहली अंतरराष्ट्रीय उड़ान एक सपना थी – नई जगहें, नई भाषाएं, लेकिन बिसात वही। उन्होंने एशियन यूथ, वर्ल्ड यूथ, और कॉमनवेल्थ जैसी प्रतियोगिताओं में अपनी जीत के झंडे गाड़े।
हर जीत उन्हें ग्रैंडमास्टर के और करीब ले जा रही थी। हर हार उन्हें और मज़बूत बना रही थी। उन्होंने कई बार कहा है –
मुझे हारने से डर नहीं लगता, क्योंकि वो सिखाती है कि अगली बार क्या नहीं करना है।
2024: जब देश का सिर ऊंचा हुआ

2024 में जब भारत ने चेस ओलिंपियाड जीता, दिव्या उस टीम का हिस्सा थीं। उन्होंने कठिन गेम्स में न सिर्फ अपनी टीम को उबारा, बल्कि अपने प्रदर्शन से दुनिया का ध्यान खींचा।
यह जीत सिर्फ मेडल की नहीं थी, यह बताने की थी कि भारत की बेटियां अब सिर्फ पढ़ाई या कला ही नहीं, दिमाग के खेल में भी अव्वल हैं।
2025: जब इतिहास लिखा गया
FIDE महिला वर्ल्ड कप के फाइनल में दिव्या का मुकाबला भारत की दिग्गज खिलाड़ी कोनेरू हम्पी से था। फाइनल में दोनों क्लासिकल गेम ड्रॉ रहे और फैसला टाईब्रेक में गया। यह वो पल था जहां अनुभव और युवा जोश आमने-सामने थे।
दिव्या ने निडर होकर बाजियां खेलीं। उन्होंने हम्पी के हर डिफेंस को चीरते हुए जीत हासिल की। इस जीत के साथ वह न सिर्फ वर्ल्ड चैंपियन बनीं, बल्कि भारत की 88वीं ग्रैंडमास्टर भी।
दिव्या की चाल: दिमाग से दिल तक
दिव्या का खेल विश्लेषणात्मक है लेकिन उसकी आत्मा भावनाओं से जुड़ी होती है। वह कहती हैं –
हर बाजी में मैं खुद को देखती हूं। जब जीतती हूं, तो लगता है मैंने ज़िंदगी की एक जंग जीत ली।
उनकी चाल में आत्मविश्वास है, संयम है, और सबसे बढ़कर – वह सीख है जो उन्हें हर रोज़ प्रेरित करती है आगे बढ़ने के लिए।
हर लड़की के लिए एक प्रेरणा

आज दिव्या देशमुख सिर्फ एक नाम नहीं, एक उम्मीद बन गई हैं। उन्होंने दिखाया कि सपने छोटे शहरों से भी निकल सकते हैं और दुनिया की सबसे ऊंची जगह तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि
"मोहरों का खेल हो या ज़िंदगी का, जो चाल सोच-समझकर चलता है, वही चैंपियन बनता है।"
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