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लाहौर में जगहों के हिंदू-सिख नाम बहाल का फैसला टला : कट्‌टरपंथियों के विरोध के बाद बैकफुट पर मरियम नवाज सरकार

News Affair Team

Thu, May 28, 2026

इस्लामाबाद.

लाहौर की सड़कों, चौकों और इलाकों के पुराने हिंदू और सिख दौर के नाम बहाल करने की योजना फिलहाल रोक दी गई है। मरियम नवाज सरकार ने कट्टरपंथी संगठनों और सोशल मीडिया पर बढ़ते विरोध के बाद यह फैसला टाल दिया। कई लोगों ने इसे पाकिस्तान में हिंदू और सिख पहचान को फिर से सामने लाने की कोशिश बताकर धार्मिक मुद्दा बना दिया था।

मोहम्मद अली एजाज ने पाकिस्तानी मीडिया से कहा कि इस मामले में अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। प्रशासन पूरे मुद्दे पर दोबारा विचार कर रहा है।

नवाज शरीफ की बैठक में पास हुआ था प्रस्ताव

16 मार्च को लाहौर हेरिटेज एरियाज़ रिवाइवल प्रोजेक्ट (Lahore Authority for Heritage Revival) की बैठक हुई थी, जिसकी अध्यक्षता नवाज शरीफ ने की थी। बैठक में मरियम नवाज भी मौजूद थीं।

इसी बैठक में लाहौर के कई प्री-पार्टिशन नामों को दोबारा बहाल करने का प्रस्ताव मंजूर किया गया था। बाद में मई में पंजाब कैबिनेट ने भी इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी थी।

सरकार का कहना था कि इस पहल का मकसद शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करना है। नवाज शरीफ ने बैठक में कहा था कि यूरोपीय देश अपने ऐतिहासिक नामों और विरासत के साथ छेड़छाड़ नहीं करते और पाकिस्तान को भी अपनी विरासत बचानी चाहिए।

कट्टरपंथी विरोध के बाद बढ़ा दबाव

फैसले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर विरोध तेज हो गया। कुछ कट्टरपंथी समूहों और व्लॉगर्स ने आरोप लगाया कि सरकार हिंदू और सिख पहचान को दोबारा स्थापित करने की कोशिश कर रही है।

विवाद बढ़ने के बाद सरकार पर राजनीतिक दबाव भी बढ़ गया। प्रशासन को आशंका थी कि मामला बड़ा सामाजिक और धार्मिक विवाद बन सकता है, जिसके बाद योजना को फिलहाल रोक दिया गया।

इतिहासकारों और विशेषज्ञों की बैठक बुलाई गई

विरोध के बाद लाहौर हेरिटेज एरियाज़ रिवाइवल प्रोजेक्ट ने इतिहासकारों, शहरी योजनाकारों और आर्किटेक्ट्स की बैठक बुलाई। इसमें शहर की ऐतिहासिक पहचान और पुराने नामों को बचाने पर चर्चा हुई।

बैठक में शामिल कई विशेषज्ञों ने कहा कि लाहौर की विरासत सिर्फ इमारतों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके पुराने नाम और सांस्कृतिक पहचान भी उसकी ऐतिहासिक धरोहर का हिस्सा हैं।

बंटवारे के बाद बदल दिए गए थे नाम

1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद पाकिस्तान में कई इलाकों के नाम बदल दिए गए थे। हालांकि लाहौर में आज भी कई पुराने हिंदू, सिख और ब्रिटिश दौर के नाम आम बोलचाल में इस्तेमाल होते हैं।

इतिहासकारों का मानना है कि लाहौर ने अपने पुराने सामाजिक ढांचे और सांस्कृतिक स्मृतियों को दूसरे शहरों की तुलना में ज्यादा संभालकर रखा। यही वजह है कि शहर का प्री-पार्टिशन इतिहास आज भी लोगों की यादों में जिंदा है।

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