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मराठी मूवी को हटाकर लगाई गई सैयारा : MNS ने दी मल्टीप्लेक्स के शीशे तोड़ने की धमकी; राउत बोले- ये भाषा और संस्कृति की लड़ाई

News Affair Team

Mon, Jul 28, 2025

मनोरंजन डेस्क.

अहान पांडे की डेब्यू फिल्म "सैयारा" ने एक हफ्ते में ही 200 करोड़ से ज्यादा का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन करके सबका ध्यान खींचा है। लेकिन इस सफलता की चमक के पीछे एक नया विवाद खड़ा हो गया है। महाराष्ट्र में मराठी फिल्म "ये रे ये रे पैसा 3" को मल्टीप्लेक्स से हटाकर 'सैयारा' को प्राथमिकता देने पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) और शिवसेना ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।

जहां एक ओर 'सैयारा' को ऑडियंस का जबरदस्त रिस्पॉन्स मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय भाषाओं, खासकर मराठी सिनेमा के साथ हो रहे 'अन्याय' का मुद्दा उठने लगा है।

सैयारा के लिए हटा दी गई मराठी फिल्म

18 जुलाई 2025 को रिलीज हुई मराठी फिल्म "ये रे ये रे पैसा 3" को शुरुआत में अच्छा रिस्पॉन्स मिला। लेकिन मल्टीप्लेक्स मालिकों ने इसे मात्र एक हफ्ते के अंदर हटा दिया और उसकी जगह पर 'सैयारा' को चारों शोज दे दिए।

MNS सिनेमा विंग के अध्यक्ष अमेय खोपकर ने इस पर तीखा विरोध दर्ज कराते हुए कहा,

मुंबई के दिल में ही मराठी फिल्मों के लिए कोई जगह नहीं बची है। अगर आगे से मराठी सिनेमा के साथ अन्याय हुआ तो मल्टीप्लेक्स के शीशे तोड़ दूंगा।

राजनीतिक बयानबाजी और तीखी प्रतिक्रियाएं

केवल MNS ही नहीं, शिवसेना सांसद संजय राउत ने भी इस विवाद पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा-

मराठी सिनेमा के लिए सब एकजुट हो रहे हैं, फिर भी हमारी फिल्म को हटा कर हिंदी फिल्म को जगह दी जा रही है। ये सिर्फ फिल्म की नहीं, बल्कि भाषा और संस्कृति की लड़ाई है। जय महाराष्ट्र!

बॉक्स ऑफिस और व्यावसायिक दबाव

'सैयारा' को निर्देशक मोहित सुरी ने बनाया है, और इसमें अहान पांडे ने लीड रोल निभाया है। यह फिल्म अपने रिलीज के पहले ही दिन से चर्चा में रही और अब तक ₹200 करोड़ का कलेक्शन कर चुकी है। यही वजह है कि मल्टीप्लेक्स मालिकों ने ज्यादा स्क्रीन्स देने का फैसला लिया।

मल्टीप्लेक्स ऑपरेटर्स का तर्क है कि उन्हें आर्थिक रूप से व्यवहारिक निर्णय लेने होते हैं, और 'सैयारा' की डिमांड के चलते उन्होंने यह स्क्रीन्स अलॉट किए।

क्या मराठी सिनेमा को पीछे धकेला जा रहा है?

मराठी इंडस्ट्री हमेशा से कंटेंट-ओरिएंटेड सिनेमा के लिए जानी जाती है। 'सैराट', 'नटसम्राट', 'कट्यार कालजात घुसली' जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर मिसाल कायम की है। लेकिन हाल के वर्षों में बड़े बैनर्स और हिंदी सिनेमा के दबाव में कई मराठी फिल्मों को स्क्रीन स्पेस नहीं मिल पा रहा है।

अमेय खोपकर और संजय राउत जैसे नेताओं का यह मानना है कि ये एक सांस्कृतिक असमानता और व्यावसायिक अन्याय का मामला है, जहां मराठी सिनेमा को उसके अपने ही राज्य में उचित मंच नहीं मिल रहा।

सिनेमा मालिक बोले- हम मराठी सिनेमा के लिए प्रतिबद्ध

जब मीडिया ने मल्टीप्लेक्स मालिकों से संपर्क किया, तो उनका जवाब था -

हम दर्शकों की मांग और टिकट बिक्री को ध्यान में रखकर फिल्में लगाते हैं। सैयारा ने रिकॉर्ड तोड़ कमाई की है और हमें उसे प्राथमिकता देनी पड़ी। लेकिन हम मराठी सिनेमा के लिए भी प्रतिबद्ध हैं।

मराठी इंडस्ट्री का भविष्य और संभावनाएं

इस विवाद ने एक बार फिर मराठी सिनेमा को लेकर नीतिगत बहस छेड़ दी है। क्या महाराष्ट्र सरकार को क्षेत्रीय सिनेमा को कोटा देने जैसा कोई नियम बनाना चाहिए? क्या हिंदी फिल्मों को स्क्रीन देने से पहले मराठी फिल्मों के शोज सुनिश्चित किए जाने चाहिए?

फिल्म निर्माता और सामाजिक कार्यकर्ता इस मुद्दे को और भी व्यापक बना रहे हैं। उनके अनुसार, यदि यही स्थिति रही तो स्थानीय भाषाओं की पहचान खतरे में पड़ सकती है।

सोशल मीडिया पर समर्थन और विरोध

इस पूरे विवाद पर सोशल मीडिया दो भागों में बंटा नज़र आया। एक वर्ग ने सैयारा की सफलता को सराहा, वहीं दूसरे ने मराठी सिनेमा के हक की बात की।

#SupportMarathiCinema और #SayaraControversy जैसे ट्रेंड्स ट्विटर और इंस्टाग्राम पर ट्रेंड करने लगे। कई मराठी सेलेब्रिटीज़ ने भी इस मामले में अपनी आवाज़ उठाई।

संभावित समाधान और आगे की राह

  • सरकार को मल्टीप्लेक्स पॉलिसी में बदलाव करना चाहिए, जिसमें मराठी फिल्मों के लिए न्यूनतम स्क्रीन गारंटी हो।

  • फिल्म प्रमोशन बजट और विज्ञापन में भी मराठी फिल्मों को बढ़ावा दिया जाए।

  • सामाजिक आंदोलन की बजाय, संस्थागत बातचीत के ज़रिए समाधान निकाला जाए।

  • डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को भी मराठी कंटेंट के लिए अनिवार्य स्थान देना चाहिए।

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