सबसे ताकतवर अल नीनो का फरवरी 2027 तक खतरे की आशंका : भारत में कमजोर मानसून के बाद सूखे की चिंता; 4.51 लाख अतिरिक्त मौतों का अनुमान
नई दिल्ली.
प्रशांत महासागर में तेजी से गर्म हो रहा पानी दुनिया के मौसम का मिजाज बदल सकता है। मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, इस साल विकसित हो रहा अल नीनो असाधारण रूप से ताकतवर हो सकता है। इसका असर तापमान से लेकर बारिश के पैटर्न तक दिखाई दे सकता है। कहीं भीषण गर्मी और सूखे का खतरा बढ़ेगा, तो कहीं सामान्य से ज्यादा बारिश और बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के मुताबिक, अल नीनो के दिसंबर 2026 के आसपास चरम पर पहुंचने की आशंका है। इसके फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना लगभग 100% जताई गई है। हालिया पूर्वानुमानों में प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से करीब 3.7 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहने की आशंका भी जताई गई है। यह इसे 1950 के बाद के सबसे ताकतवर अल नीनो घटनाक्रमों में शामिल कर सकता है।

4.51 लाख अतिरिक्त मौतों का अनुमान, गर्मी सबसे बड़ा खतरा
शिकागो यूनिवर्सिटी के क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि जून 2026 से फरवरी 2027 के बीच अल नीनो से जुड़ी असामान्य गर्मी के कारण दुनिया में करीब 4.51 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। यह अनुमान सामान्य वर्षों की तुलना में गर्मी से होने वाली संभावित अतिरिक्त मौतों पर आधारित है, न कि पहले से तय मृत्यु संख्या पर।
शोधकर्ताओं के अनुसार, अल नीनो के कारण बेहद गर्म दिनों की संख्या सामान्य से करीब 44% ज्यादा हो सकती है। इसका सबसे गंभीर असर उन इलाकों में पड़ने की आशंका है, जहां लोगों के पास गर्मी से बचाव, स्वास्थ्य सेवाओं और बिजली जैसी सुविधाओं की कमी है।
लगातार बढ़ते तापमान से हीट स्ट्रोक, शरीर में पानी की कमी और दिल से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। खेतों, जलाशयों और बिजली की मांग पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है।
भारत में 13% कम बारिश, सूखे की चिंता बढ़ी
अल नीनो को भारत में मानसून के कमजोर पड़ने से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, मानसून पर इसका असर हर साल एक जैसा नहीं होता। इस बार भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से करीब 12.6% कम बारिश के साथ खत्म हुआ। भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, जून से सितंबर के बीच देश में करीब 759.4 मिमी बारिश दर्ज की गई, जबकि सामान्य बारिश लगभग 868.6 मिमी होती है। यह 2001 के बाद चौथा सबसे कम बारिश वाला मानसून रहा।
कम बारिश का असर खेती, जलाशयों और भूजल की उपलब्धता पर पड़ सकता है। रबी फसलों की सिंचाई के लिए पानी की जरूरत बढ़ने के साथ कुछ इलाकों में पेयजल संकट की आशंका भी रहेगी।
हालांकि, अल नीनो के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि भारत के हर राज्य में सूखा पड़ेगा। बारिश का स्थानीय वितरण, हिंद महासागर की परिस्थितियां और दूसरे मौसमी कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं।
यूरोप में गर्मी और नदियों के जलस्तर पर असर
अल नीनो का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहता। प्रशांत महासागर में तापमान बढ़ने से वायुमंडलीय परिसंचरण और दुनिया के कई हिस्सों में बारिश के पैटर्न में बदलाव आ सकता है। इसके कारण कुछ क्षेत्रों में सूखा और जंगलों में आग का जोखिम बढ़ता है, जबकि दूसरे इलाकों में भारी बारिश की परिस्थितियां बन सकती हैं।
WMO ने चेताया है कि आने वाले महीनों में कई क्षेत्रों में सामान्य से ज्यादा तापमान रहने और बारिश के पैटर्न में बदलाव की आशंका है। इसका असर जल संसाधनों, खेती और स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

क्या है अल नीनो, जो दुनिया का मौसम बदल देता है?
अल नीनो प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा होने की प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है। इसे समझने के लिए मौसम वैज्ञानिक प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र के तापमान और हवाओं के पैटर्न पर नजर रखते हैं।
इनमें नीनो 3.4 क्षेत्र खास महत्व रखता है। यह भूमध्य रेखा के आसपास प्रशांत महासागर के मध्य-पूर्वी हिस्से में स्थित एक निर्धारित क्षेत्र है। यहां समुद्र की सतह के तापमान में होने वाले बदलावों से अल नीनो की स्थिति और उसकी तीव्रता का आकलन करने में मदद मिलती है।
सामान्य परिस्थितियों में व्यापारिक हवाएं पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं। ये गर्म सतही पानी को इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में धकेलती हैं। दक्षिण अमेरिका के तट के पास समुद्र की गहराई से अपेक्षाकृत ठंडा पानी ऊपर आता रहता है।
अल नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। गर्म पानी पूर्व की ओर फैलने लगता है और प्रशांत महासागर के मध्य तथा पूर्वी हिस्से का तापमान बढ़ जाता है। इससे वायुमंडल में गर्मी और नमी का वितरण बदलता है, जिसका असर दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों के मौसम पर पड़ सकता है।
पहले भी दिख चुका है अल नीनो का असर
इतिहास में कई ताकतवर अल नीनो घटनाओं के दौरान दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौसम की चरम स्थितियां दर्ज की गई हैं। अल नीनो का प्रभाव हर जगह एक जैसा नहीं होता। किसी क्षेत्र में बारिश बढ़ सकती है, तो दूसरे में पानी की कमी हो सकती है।

दिसंबर तक रहेगी नजर, 2027 की शुरुआत भी अहम
मौसम एजेंसियां आने वाले महीनों में प्रशांत महासागर के तापमान, हवाओं और बारिश के पूर्वानुमानों पर नजर रखेंगी। अल नीनो के मजबूत होने की आशंका के बीच सरकारों और स्थानीय प्रशासन के लिए गर्मी से बचाव, जल प्रबंधन, कृषि सलाह और मौसम की समय पर चेतावनी देना अहम होगा।
फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यह है कि अल नीनो पहले से गर्म हो रही दुनिया में तापमान को और बढ़ा सकता है। इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि यह कितना ताकतवर होता है, कितने समय तक बना रहता है और अलग-अलग क्षेत्रों में अन्य मौसमी परिस्थितियां कैसी रहती हैं।
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