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25th May 2026

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बच्चे को जन्म देने के दो दिन बाद दी परीक्षा; 23 साल की श्रीपति ने रचा इतिहास

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तमिलनाडु की आदिवासी बेटी बनी सिविल जज : बच्चे को जन्म देने के दो दिन बाद दी परीक्षा; 23 साल की श्रीपति ने रचा इतिहास

News Affair Team

Sun, May 24, 2026

चेन्नई.

तमिलनाडु के एक छोटे से आदिवासी गांव से निकली 23 साल की श्रीपति ने ऐसा मुकाम हासिल किया है, जिसकी आज पूरे राज्य में चर्चा हो रही है। तिरुवन्नामलाई जिले के जव्वादुमलाई क्षेत्र के पुलियूर गांव की रहने वाली श्रीपति राज्य की पहली आदिवासी महिला बनी हैं, जिन्हें सिविल जज के पद के लिए चुना गया है।

उनकी कहानी सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि संघर्ष, हिम्मत और जुनून की मिसाल बन गई है। खास बात यह है कि श्रीपति ने सिविल जज की परीक्षा बच्चे को जन्म देने के महज दो दिन बाद दी थी।

डिलीवरी के बाद पहुंचीं परीक्षा देने

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2023 में श्रीपति ने चेन्नई में सिविल जज की परीक्षा दी थी। उनका गांव चेन्नई से करीब 250 किलोमीटर दूर पहाड़ी इलाके में स्थित है।

परिवार के लोगों ने बताया कि परीक्षा से ठीक दो दिन पहले उन्होंने बच्चे को जन्म दिया था। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और परीक्षा देने पहुंचीं।

हाल ही में उन्होंने इंटरव्यू राउंड भी पूरा किया था, जिसके बाद अब उनका चयन सिविल जज के रूप में हुआ है।

गांव में ढोल-नगाड़ों से स्वागत

श्रीपति के चयन की खबर गांव पहुंचते ही खुशी का माहौल बन गया। गांव में उनके स्वागत के लिए विशेष कार्यक्रम रखा गया, जहां लोगों ने ढोल-नगाड़ों और फूल-मालाओं के साथ उनका सम्मान किया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पहली बार उनके क्षेत्र की किसी लड़की ने इतना बड़ा मुकाम हासिल किया है। इससे अब इलाके की दूसरी लड़कियों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी।

पहाड़ी गांव से जज बनने तक का सफर

श्रीपति ने शुरुआती पढ़ाई येलागिरी हिल्स क्षेत्र में की। इसके बाद उन्होंने बीए और बैचलर ऑफ लॉ की पढ़ाई पूरी की।

आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी की।

एक पहाड़ी गांव की आदिवासी लड़की का इतनी कम उम्र में जज बनना पूरे राज्य के लिए गर्व की बात है।

जो लोग सामाजिक न्याय की बात करने से बचते हैं, उनके लिए श्रीपति की सफलता करारा जवाब है।

संघर्ष से निकली प्रेरणा

श्रीपति की कहानी अब तमिलनाडु में संघर्ष और महिला सशक्तिकरण की नई पहचान बन गई है। एक आदिवासी गांव से निकलकर, मातृत्व और कठिन परिस्थितियों के बीच सिविल जज बनना लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुका है।

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