सियासत का ‘नीला’ सिग्नल : नसीमुद्दीन सिद्दीकी सपा में; अखिलेश ने मंच का रंग बदला तो मैसेज भी बदल गया
News Affair Team
Sun, Feb 15, 2026
पश्चिम यूपी की राजनीति में बड़ा उलटफेर। मुस्लिम राजनीति का बड़ा चेहरा माने जाने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। रविवार को अखिलेश यादव उन्हें साथ लेकर लखनऊ स्थित सपा कार्यालय पहुंचे और सदस्यता दिलाई।
सिर्फ सिद्दीकी ही नहीं—15,758 समर्थकों ने भी सपा जॉइन की। इनमें बड़ी संख्या बसपा के पुराने कार्यकर्ताओं की बताई जा रही है।
और हां, इस ‘जॉइनिंग’ में एक और चीज चर्चा में रही—सपा मंच के बैकड्रॉप पर ‘नीला रंग’। जो बसपा के झंडे का रंग है। मैसेज साफ था या संकेत? यही चर्चा का विषय बन गया।

गठबंधन का ऑफर या राजनीतिक इशारा?
अखिलेश ने कहा—“बहुजन समाज से हमारा पुराना रिश्ता है। गठबंधन बने भी, टूटे भी। उम्मीद है कि उस लड़ाई को आगे बढ़ाएंगे।”
राजनीतिक जानकार इसे बसपा सुप्रीमो मायावती के लिए ‘ओपन ऑफर’ मान रहे हैं।
पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) समीकरण को मजबूत करने की रणनीति के बीच सपा का यह कदम 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है।
सिद्दीकी की एंट्री क्यों अहम?
सपा में आजम खान की गैरमौजूदगी के बाद बड़ा मुस्लिम चेहरा नहीं था। ऐसे में नसीमुद्दीन की एंट्री उस खाली जगह को भरने की कोशिश मानी जा रही है।
बसपा से राजनीति शुरू करने वाले सिद्दीकी मायावती सरकार में ‘मिनी सीएम’ कहे जाते थे। 2007-12 के कार्यकाल में उनके पास 18 मंत्रालय थे।
2017 में बसपा से निष्कासन, फिर कांग्रेस जॉइन, और अब सपा। यानी तीन बड़े राजनीतिक पड़ाव पार कर चुके हैं।

मंच से शायरी और सत्ता पर निशाना
सपा जॉइन करने के बाद सिद्दीकी ने कहा—“मैं सबसे जूनियर हूं। लेकिन नेता आपको ही मानता था।”
फिर शायरी पढ़ी—
“हयात लेके चलो, कायनात लेके चलो… चलो तो सारे जमाने को साथ लेके चलो।”
योगी सरकार पर हमला करते हुए बोले—“चिड़िया की आंख पर निशाना लगाना है। 2027 में अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाना है। ज्यादा बोलोगे तो बुलडोजर चल जाएगा।”
अखिलेश के तीर—शंकराचार्य से लेकर राफेल तक
अखिलेश यादव ने भी मंच से कई मुद्दों पर सरकार को घेरा।
शंकराचार्य के अपमान का आरोप
ओवरलोड ट्रकों पर कार्रवाई में ‘चुनिंदा नंबर’ पकड़ने का दावा
गांजा और कोडीन कफ सिरप कांड का जिक्र
नोटबंदी को सपा हटाने की साजिश बताया
राफेल खरीद पर सवाल—“मेक इन इंडिया का शेर क्या जंग खाएगा?”
उन्होंने AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के भाई के बयान पर तंज कसते हुए कहा—“साइकिल पर बैठकर यूपी आएंगे।”
कांग्रेस से दूरी, पर तल्खी नहीं
24 जनवरी को सिद्दीकी ने कांग्रेस से इस्तीफा दिया था। इस्तीफे में राहुल, सोनिया और मल्लिकार्जुन खड़गे के प्रति सम्मान जताया।
कांग्रेस में सहारनपुर सांसद इमरान मसूद का कद बढ़ने और 2024 लोकसभा में तवज्जो न मिलने से वे असहज थे।
लेकिन कांग्रेस पर हमलावर नहीं हुए। वजह साफ है—यूपी में सपा-कांग्रेस गठबंधन की संभावना।

सपा की रणनीति: तीन बड़े लक्ष्य
1. मुस्लिम वोट बैंक को मैसेज
पश्चिमी यूपी में बसपा और AIMIM सक्रिय हैं। सिद्दीकी की एंट्री से सपा यह दिखाना चाहती है कि मुस्लिम नेतृत्व उसके साथ है।
2. ओवैसी फैक्टर की काट
बिहार और महाराष्ट्र में AIMIM की मौजूदगी ने सपा को सतर्क किया है। यूपी में सेंध रोकने की कोशिश है।
3. बुंदेलखंड से पश्चिम तक प्रभाव
सिद्दीकी की पकड़ सिर्फ एक इलाके तक सीमित नहीं। बुंदेलखंड से लेकर सहारनपुर तक नेटवर्क है।
2027 की तैयारी शुरू?
राजनीति में रंगों का भी मतलब होता है। मंच का ‘नीला’ बैकड्रॉप हो या पीडीए की बात—संदेश साफ है कि 2027 का बिगुल बज चुका है।
सवाल ये है—क्या यह नई दोस्ती पुराने समीकरण बदलेगी? या सिर्फ एक और चुनावी रणनीति साबित होगी?
फिलहाल सपा ने एक बड़ा दांव खेला है। अब देखना है, यह चाल शह बनती है या मात।
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