एलडीए भूखंड समायोजन घोटाला : लखनऊ में नदी किनारे 100 करोड़ की जमीन डेवलपर को की गई आवंटित; दो साल से अधूरी जांच
News Affair Team
Mon, Jul 28, 2025
लखनऊ.
लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) की गोमती नगर विस्तार योजना में 100 करोड़ रुपये के भूखंड समायोजन घोटाले का मामला सामने आने के दो साल बाद भी जांच पूरी नहीं हो सकी है। यह घोटाला 25 सितंबर 2023 को उजागर हुआ था, जब यह पता चला कि ग्राम मलेशेमऊ की नदी क्षेत्र की भूमि को फर्जीवाड़े के जरिए राज गंगा डेवलपर्स को आवंटित कर दिया गया था।
अब तक क्या हुआ?
नई जांच समिति का गठन
एलडीए ने दो साल बाद एक बार फिर इस मामले की जांच को आगे बढ़ाने के लिए नई समिति का गठन किया है। इस बार समिति की अध्यक्षता संयुक्त सचिव अर्जुन सुनील प्रताप सिंह को सौंपी गई है। साथ में तहसीलदार अमित त्रिपाठी और अधिशासी अभियंता अजीत कुमार (जोन 1) को भी समिति में शामिल किया गया है।
नदी की ज़मीन को बना दिया आवासीय
यह पूरा मामला ग्राम मलेशेमऊ की 1146.75 एकड़ भूमि से जुड़ा है। इसमें खसरा संख्या-673क वह भूमि है, जो गोमती नदी क्षेत्र में आती है। इसलिए वर्ष 2000 में अधिग्रहण के समय इसे योजना से बाहर रखा गया था। लेकिन एलडीए के अर्जन अनुभाग के कुछ अफसरों ने बिल्डर के साथ साठगांठ कर इस भूमि को दो हिस्सों में बांटा- एक हिस्सा नदी में समाहित और दूसरा एलडीए के कब्जे में दिखा दिया।
राज गंगा डेवलपर्स को कैसे मिली जमीन?
जांच में सामने आया कि यह ज़मीन पहले महादेव प्रसाद नामक व्यक्ति के नाम थी। 9 जनवरी 2006 को उन्होंने यह ज़मीन राज गंगा डेवलपर्स को बेच दी। इसके बाद बिल्डर ने एलडीए को पत्र लिखकर 6070 वर्गमीटर ज़मीन के बदले उतनी ही अविकसित ज़मीन मांगी। आश्चर्यजनक रूप से एलडीए ने महज़ 25 लाख रुपये के बाह्य विकास शुल्क पर 12 जनवरी 2007 को गोमती नगर विस्तार योजना के सेक्टर-4 में वही ज़मीन आवंटित कर दी।
जांच क्यों रुकी?
एलडीए के तत्कालीन वीसी डॉ. इन्द्रमणि त्रिपाठी ने इस मामले की जांच के लिए सचिव पवन गंगवार को जिम्मेदारी दी थी। लेकिन दोनों अधिकारियों के स्थानांतरण के बाद फाइलें दबा दी गईं और मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
2015 में खुला खेल
इसके बाद 8 मई 2015 को तत्कालीन एलडीए वीसी ने पुराने भुगतान को समायोजित करते हुए रजिस्ट्री की अनुमति दे दी। बिल्डर ने 25 अगस्त 2015 को 84.98 लाख रुपये जमा कर रजिस्ट्री करा ली और शहीद पथ के पास ग्रुप हाउसिंग और व्यावसायिक उपयोग के लिए भूखंडों पर कब्ज़ा कर लिया।
जब खुला फर्जीवाड़ा
इस पूरे मामले में जब दोबारा शिकायत दर्ज हुई, तो एलडीए ने फिर से जांच शुरू की। जांच में सामने आया कि भूमि का समायोजन फर्जी तरीके से हुआ था। इसके बाद एलडीए ने भूखंड संख्या 1269A, 1269B, 1269C, 1269D और 1269E को निरस्त कर दिया।
इन भूखंडों की वर्तमान बाजार कीमत लगभग 100 करोड़ रुपये आंकी गई है।
भ्रष्टाचार के सवाल और जनता का भरोसा
यह मामला न केवल एलडीए की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि किस तरह नदी क्षेत्र की ज़मीन को दस्तावेज़ों के जरिए आवासीय में तब्दील कर बिल्डरों को सौंपा जा रहा है।
इस बीच दो साल बीतने के बावजूद भी कोई ठोस कार्रवाई या दंडात्मक निर्णय नहीं लिया गया, जिससे जनता का सरकारी तंत्र पर विश्वास डगमगाने लगा है।
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