खामेनेई की मौत के बाद ‘तेल युद्ध’ का खतरा : पेट्रोल ₹105, सोना ₹1.90 लाख और शेयर बाजार में गिरावट; जेब पर कितना पड़ेगा भारी?
बिजनेस डेस्क.
मिडिल ईस्ट में जंग सिर्फ मिसाइलों से नहीं लड़ी जाती। यहां असली हथियार है—तेल।
और अब, जब ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो चुकी है, तो दुनिया की नजर सिर्फ बम और मिसाइल पर नहीं, बल्कि एक पतली-सी समुद्री पट्टी पर टिक गई है] नाम है होर्मुज स्ट्रेट।
यह वही रास्ता है, जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है। और अगर ईरान ने इसे बंद कर दिया, तो असर सिर्फ मिडिल ईस्ट पर नहीं—आपकी जेब पर भी पड़ेगा। पेट्रोल महंगा होगा। सोना आसमान छुएगा। शेयर बाजार गिर जाएगा।
और भारत—जो अपनी जरूरत का 90% तेल आयात करता है—उसके लिए यह किसी आर्थिक भूकंप से कम नहीं होगा।

सबसे पहले समझिए—भारत क्यों डर रहा है?
भारत अपनी जरूरत का करीब 90% कच्चा तेल विदेश से खरीदता है। और इसमें भी करीब 50% तेल होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आता है।
मतलब साफ है—अगर यह रास्ता बंद हुआ, तो भारत के पास तेल की सप्लाई कम हो जाएगी। और जब सप्लाई कम होती है, तो कीमत बढ़ती है।
अभी ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल है। लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि जंग लंबी चली तो यह 100 से 120 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है।

होर्मुज स्ट्रेट एक संकरा समुद्री रास्ता है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। इसके एक तरफ ईरान है और दूसरी तरफ ओमान और यूएई। लेकिन असली बात यह है कि यह सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं है—यह दुनिया की तेल सप्लाई की लाइफलाइन है।
दुनिया के कुल पेट्रोलियम का करीब 20% हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हर दिन करीब 1.7 से 2 करोड़ बैरल तेल यहां से दुनिया भर में भेजा जाता है। भारत के लिए यह रास्ता और भी ज्यादा अहम है।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई जैसे देशों से खरीदता है। और इनमें से ज्यादातर तेल इसी होर्मुज रास्ते से आता है।
भारत रोजाना 26 लाख बैरल तेल इसी रास्ते से मंगाता है
डेटा के मुताबिक भारत हर दिन करीब 26 लाख बैरल कच्चा तेल होर्मुज स्ट्रेट के जरिए मंगाता है। यह भारत के कुल तेल आयात का करीब 50% हिस्सा है।
अब जरा कल्पना कीजिए—अगर युद्ध बढ़ता है और यह रास्ता बंद हो जाता है, तो क्या होगा? सीधा जवाब है—भारत में तेल की कमी और कीमतों में विस्फोट।
तेल महंगा होगा तो पेट्रोल-डीजल महंगा होगा। पेट्रोल-डीजल महंगा होगा तो ट्रांसपोर्ट महंगा होगा। और ट्रांसपोर्ट महंगा होगा तो हर चीज महंगी हो जाएगी। यानी, युद्ध वहां होगा—महंगाई यहां बढ़ेगी।

पेट्रोल ₹105 और डीजल ₹96 तक पहुंच सकता है
अगर तेल महंगा हुआ, तो सबसे पहले असर पेट्रोल और डीजल पर दिखेगा। दिल्ली में अभी पेट्रोल करीब ₹95 प्रति लीटर है। लेकिन संकट बढ़ा तो यह ₹105 तक जा सकता है। डीजल ₹88 से बढ़कर ₹96 तक जा सकता है।
यह सिर्फ आंकड़ा नहीं है। यह हर उस भारतीय की कहानी है, जो रोज बाइक या कार से निकलता है। पेट्रोल महंगा होगा तो बस का किराया बढ़ेगा, ट्रांसपोर्ट महंगा होगा, सब्जी और राशन महंगे होंगे। मतलब, महंगाई हर घर तक पहुंचेगी।
इतिहास गवाह है, जंग का मतलब महंगा तेल
यह पहली बार नहीं होगा। इतिहास बताता है, हर बड़े युद्ध में तेल महंगा हुआ।
1973 – अरब-इजराइल युद्ध
तेल $3 से $12 हो गया
1990 – इराक-कुवैत युद्ध
तेल $17 से $46 पहुंच गया
2003 – अमेरिका-इराक युद्ध
तेल $30 से $40 हुआ
2022 – रूस-यूक्रेन युद्ध
तेल $80 से $130 तक गया
अब सवाल है—क्या खामेनेई की मौत के बाद शुरू हुआ यह संघर्ष भी वही कहानी दोहराएगा?
सरकार चाहे तो राहत दे सकती है
भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें तेल कंपनियां तय करती हैं। लेकिन अंतिम फैसला सरकार के हाथ में होता है। सरकार चाहे तो टैक्स घटा सकती है और कंपनियों को कीमत न बढ़ाने को कह सकती है। लेकिन अगर जंग लंबी चली, तो सरकार के लिए भी कीमतें रोकना मुश्किल होगा।
भारत के एक्सपोर्ट पर भी संकट, 10% से ज्यादा व्यापार इसी रास्ते से
यह संकट सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है। भारत का 10% से ज्यादा नॉन-ऑयल एक्सपोर्ट भी इसी रास्ते से होता है। भारत यूएई, सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे देशों को बासमती चावल, चाय, मसाले, फल-सब्जियां और इंजीनियरिंग सामान भेजता है।
भारत ने हाल ही में इन खाड़ी देशों को करीब 47.6 बिलियन डॉलर का नॉन-ऑयल सामान एक्सपोर्ट किया है। अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद होता है या शिपिंग महंगी होती है, तो:
एक्सपोर्ट महंगा होगा
भारतीय सामान महंगा होगा
और ग्लोबल मार्केट में भारत की प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है
यानी भारत के व्यापार पर सीधा असर पड़ेगा।

शेयर बाजार में गिरावट क्यों तय मानी जा रही है?
भारतीय शेयर बाजार हमेशा तेल की कीमतों के प्रति संवेदनशील रहा है। जब तेल महंगा होता है, तो कंपनियों की लागत बढ़ जाती है। इससे उनका मुनाफा कम होता है। और जब मुनाफा कम होता है, तो निवेशक शेयर बेचने लगते हैं।
अगर ब्रेंट क्रूड 80-85 डॉलर प्रति बैरल के पार जाता है, तो भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट देखी जा सकती है। खासकर इन सेक्टर पर असर पड़ेगा:
एविएशन
पेंट
टायर
लॉजिस्टिक्स
ट्रांसपोर्ट
इसके अलावा विदेशी निवेशक पहले ही भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। युद्ध से यह ट्रेंड और तेज हो सकता है।

सोना और चांदी क्यों बन रहे हैं निवेशकों की पहली पसंद?
जब दुनिया में युद्ध या तनाव होता है, तो निवेशक जोखिम वाले निवेश से दूर हो जाते हैं। शेयर बाजार जोखिम भरा लगता है। ऐसे में लोग सुरक्षित निवेश की ओर जाते हैं।
और दुनिया में सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है—सोना।
अभी हाल ही में 24 कैरेट सोने की कीमत 1.59 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम तक पहुंच गई है। वहीं चांदी की कीमत 2.66 लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर युद्ध बढ़ता है, तो सोने और चांदी की कीमतें और बढ़ सकती हैं।
ईरान के लिए भी यह ‘डबल एज’ हथियार
होर्मुज स्ट्रेट बंद करना ईरान के लिए आसान नहीं है। क्योंकि इससे ईरान को भी नुकसान होगा। ईरान खुद रोज 17 लाख बैरल तेल निर्यात करता है।
अगर रास्ता बंद हुआ, तो वह अपना तेल नहीं बेच पाएगा। इससे उसकी अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। और चीन, जो ईरान का सबसे बड़ा ग्राहक है, उसके साथ रिश्ते भी खराब हो सकते हैं।
सऊदी अरब के पास विकल्प है, लेकिन सीमित
सऊदी अरब के पास ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ है। यह रोज 50 लाख बैरल तेल भेज सकती है। लेकिन यह होर्मुज स्ट्रेट का पूरा विकल्प नहीं है। इसलिए दुनिया अब भी होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर है।
क्या भारत के पास कोई दूसरा विकल्प है?
भारत के पास कुछ विकल्प हैं, लेकिन वे सीमित हैं। सऊदी अरब और यूएई ने पाइपलाइन बनाई हैं, जो होर्मुज स्ट्रेट को बायपास कर सकती हैं। लेकिन इन पाइपलाइन की क्षमता सीमित है।
मतलब, वे पूरी जरूरत पूरी नहीं कर सकतीं। इसलिए होर्मुज स्ट्रेट भारत के लिए अभी भी सबसे अहम रास्ता है।
भारत की तैयारी शुरू
भारत सरकार इस संकट के लिए तैयारी कर रही है। भारत, दूसरे देशों से तेल खरीद बढ़ा रहा है, अपने स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व पर नजर रख रहा है, यह रिजर्व संकट के समय काम आता है।
आगे क्या होगा? सब कुछ युद्ध की दिशा पर निर्भर
विशेषज्ञों का कहना है कि अभी स्थिति “Wait and Watch” वाली है। अगर युद्ध सीमित रहता है, तो बाजार जल्द संभल सकता है।
लेकिन अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद होता है, तेल रिफाइनरियों पर हमला होता है, या अमेरिका युद्ध में शामिल होता है तो इसका असर लंबे समय तक रह सकता है।
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