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29th September 2026

ब्रेकिंग

चिप्स-कोल्ड ड्रिंक में आर्टिफिशियल स्वीटनर पर चेतावनी; हाई शुगर-नमक-फैट पर लाल निशान की तैयारी

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News Affair Team

Mon, Sep 28, 2026

नई दिल्ली.

पैकेटबंद खाने-पीने की चीजों के लेबल में बड़ा बदलाव प्रस्तावित है। चिप्स, कोल्ड ड्रिंक और दूसरे ऐसे पैकेज्ड फूड में अगर नॉन-कैलोरिक स्वीटनर का इस्तेमाल किया गया है, तो पैकेट के सामने ही इसका स्पष्ट उल्लेख करने का प्रस्ताव है।

FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि ऐसे उत्पादों पर “CONTAIN NON CALORIC SWEETENER” लिखा जा सकता है। अभी नॉन-कैलोरिक स्वीटनर से जुड़ी यह घोषणा पैकेट के लेबल पर निर्धारित तरीके से दी जाती है। FSSAI के मौजूदा लेबलिंग नियमों में भी नॉन-कैलोरिक स्वीटनर वाले उत्पादों के लिए यह घोषणा निर्धारित है।

नमक-शुगर-फैट ज्यादा तो सामने लाल षटकोण

FSSAI ने पैकेज्ड फूड में ज्यादा शुगर, नमक या सैचुरेटेड फैट की जानकारी भी पैकेट के सामने देने के लिए लाल षटकोण वाला चेतावनी लेबल प्रस्तावित किया है। पहले FSSAI ने इसे दो चरणों में लागू करने का प्रस्ताव दिया था। पहले चरण में उन उत्पादों को शामिल किया जाना था, जिनमें निर्धारित सीमा से दो या उससे ज्यादा पोषक तत्व अधिक हों।

दूसरे चरण में किसी एक पोषक तत्व की सीमा पार करने वाले उत्पादों को शामिल करने की बात थी। अब FSSAI ने सुप्रीम कोर्ट के सामने इसे एक ही फेज में लागू करने का प्रस्ताव रखा है। यानी निर्धारित सीमा से शुगर, नमक या फैट में से किसी एक की मात्रा अधिक होने पर भी संबंधित चेतावनी लेबल लगाने का प्रस्ताव है।

कंपनियों को मिल सकता है 365 दिन का समय

FSSAI के प्रस्ताव के मुताबिक ड्राफ्ट नियमों को तैयार और अंतिम रूप देने में करीब 4 महीने लग सकते हैं। इसके बाद सुझाव/आपत्तियां लेने की प्रक्रिया और फिर कंपनियों को नए लेबलिंग सिस्टम में बदलाव के लिए समय देने का प्रस्ताव है।

रिपोर्टों के मुताबिक कंपनियों को नए लेबल अपनाने के लिए 365 दिन की अवधि देने का प्रस्ताव रखा गया है। यह फिलहाल प्रस्तावित टाइमलाइन है, अंतिम लागू नियम नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने देरी पर उठाए सवाल

यह मामला 3S एंड अवर हेल्थ सोसाइटी की जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में पैकेज्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लागू करने की मांग की गई है।

13 अगस्त की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से इस दिशा में तेजी से काम करने को कहा था। 10 सितंबर को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने प्रस्ताव के कई पहलुओं पर स्पष्टीकरण मांगा और FSSAI को विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था।

कोर्ट ने लेबल के आकार, रंग, फॉन्ट, पोषक तत्वों की सीमा, मीठे पेय पदार्थों की पहचान, अलग-अलग चेतावनी चिह्न और इसे अनिवार्य बनाने की समयसीमा जैसे मुद्दों पर भी सवाल उठाए थे।

क्या है Front-of-Pack Labelling?

Front-of-Pack Labelling यानी FoPL का मतलब है कि किसी खाद्य उत्पाद की महत्वपूर्ण पोषण संबंधी चेतावनी पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में छिपी रहने के बजाय सामने स्पष्ट रूप से दिखाई दे।

प्रस्तावित व्यवस्था में लाल षटकोण के जरिए HIGH SUGAR, HIGH SALT या HIGH FAT जैसी चेतावनी दिखाई जा सकती है। इसका उद्देश्य ग्राहक को खरीदारी के समय ही उत्पाद में मौजूद प्रमुख पोषक तत्वों के बारे में आसान और तुरंत समझ आने वाली जानकारी देना है।

घी, तेल, नमक और शहद को लेकर क्या प्रस्ताव है?

FSSAI के प्रस्ताव में कुछ श्रेणियों को फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी से बाहर रखने की बात सामने आई है। इनमें कुछ सिंगल-इंग्रीडिएंट उत्पाद और ऐसे खाद्य पदार्थ शामिल हैं जिनमें संबंधित पोषक तत्व प्राकृतिक रूप से अधिक होते हैं।

रिपोर्टों में शुद्ध घी, खाद्य तेल, साधारण नमक, चीनी, गुड़ और शहद जैसी श्रेणियों को संभावित छूट में शामिल बताया गया है। हालांकि अंतिम नियम अधिसूचित होने के बाद ही इसकी स्थिति स्पष्ट होगी।

अभी पोषण की जानकारी कहां मिलती है?

फिलहाल पैकेज्ड फूड की विस्तृत न्यूट्रिशनल जानकारी आमतौर पर पैकेट के पीछे या किनारे दी जाती है। इसमें कैलोरी, प्रोटीन, फैट, कार्बोहाइड्रेट, शुगर और सोडियम आदि की मात्रा बताई जाती है। FoPL का प्रस्ताव इसी जानकारी को ग्राहक की नजर में ज्यादा स्पष्ट और प्रमुख बनाने से जुड़ा है।

क्यों हो रही है इस लेबलिंग की बात?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 10 सितंबर के आदेश में हाई फैट, शुगर और सॉल्ट यानी HFSS तथा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग और हाइपरटेंशन जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ते हुए फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग की जरूरत पर चर्चा की थी।

हालांकि नॉन-कैलोरिक स्वीटनर को सीधे डायबिटीज या हार्ट अटैक का कारण बताना सही नहीं होगा। इन बीमारियों के जोखिम कई कारकों पर निर्भर करते हैं। इसलिए प्रस्तावित लेबल का उद्देश्य उत्पाद में इस्तेमाल स्वीटनर या पोषक तत्व की मौजूदगी की जानकारी उपभोक्ता तक स्पष्ट रूप से पहुंचाना है।

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