नाम बदलने की बहस, खजाना खाली : मध्य प्रदेश में मनरेगा पर 704 करोड़ की देनदारी; बुनियादी ढांचे का बैलेंस जीरो
News Affair Team
Sun, Feb 15, 2026
भोपाल.
एक तरफ महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का नाम बदलकर ‘वीबी-जीरामजी’ करने की राजनीतिक बहस चल रही है। दूसरी तरफ हकीकत ये है कि मध्य प्रदेश में इस योजना का खाता खाली है।
राज्यसभा में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जो आंकड़े रखे, वे बताते हैं कि एमपी पर मनरेगा के तहत 704.64 करोड़ रुपए की देनदारी बकाया है। यानी काम हो चुका है, लेकिन भुगतान का इंतजार है।
जीरो बैलेंस वाले विभाग: आवास और सड़क आगे
दिलचस्प बात यह है कि जिन योजनाओं में बुनियादी ढांचा बनता है, वहां राज्य का प्रदर्शन ‘जीरो बैलेंस’ वाला है।
प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण – ₹0.00 शेष
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना – ₹0.00 शेष
कौशल विकास (DDU-GKY) – ₹0.00
वाटरशेड विकास – ₹0.00
9 फरवरी 2026 तक की स्थिति के मुताबिक, इन योजनाओं में केंद्र से मिला पूरा पैसा खर्च हो चुका है।
सरल भाषा में कहें तो घर बने, सड़कें बनीं, ट्रेनिंग कार्यक्रम चले—और पैसा खप गया।
मनरेगा: काम पूरा, मजदूरी अधर में
राज्यसभा में दिग्विजय सिंह और डॉ. जॉन ब्रिटास के सवालों के जवाब में जो तस्वीर सामने आई, वह थोड़ी चिंताजनक है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में 9 फरवरी तक एमपी पर 704.64 करोड़ रुपए की देनदारी बकाया है। इसमें मजदूरी और सामग्री दोनों शामिल हैं।
10 फरवरी तक ‘स्टेट नोडल अकाउंट’ में बैलेंस माइनस (-0.01997 लाख रुपए) दिखा। यानी खाता लगभग खाली।
अब सवाल है—अगर पैसा नहीं आया तो मजदूरों का भुगतान कैसे होगा?
पिछले सालों का ट्रेंड: पैसा बढ़ा, दबाव भी बढ़ा
केंद्र से मिलने वाली राशि पिछले तीन साल में बढ़ी है:
2022-23: ₹5,711.77 करोड़
2023-24: ₹5,891.65 करोड़
2024-25: ₹6,252.03 करोड़
राज्य ने भी अपने हिस्से का योगदान बढ़ाया। 2024-25 में सामग्री घटक के लिए लगभग ₹860.89 करोड़ जारी किए गए।
गणित साफ है—काम बढ़ा, फंड बढ़ा, लेकिन भुगतान का दबाव भी बढ़ गया।
सामाजिक सुरक्षा: यहां पैसा पड़ा है
जहां मनरेगा में पैसे की कमी है, वहीं राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के तहत एमपी के पास 9,492.49 लाख रुपए (करीब 94.92 करोड़) अव्ययित पड़े हैं।
यह रकम बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों की पेंशन से जुड़ी है।
यानी एक योजना में भुगतान अटका है, दूसरी में पैसा खर्च नहीं हुआ।
डिजिटल जमीन और कौशल
डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत 26.34 करोड़ रुपए शेष हैं।
कौशल विकास योजनाओं में बैलेंस शून्य है—मतलब फंड पूरी तरह उपयोग हो चुका है।
एमपी को “फंड यूटिलाइजेशन” के मामले में अग्रणी बताया जा रहा है, क्योंकि अधिकांश योजनाओं में बैलेंस जीरो है।
देशभर की तस्वीर
राष्ट्रीय स्तर पर मनरेगा की लंबित देनदारियों में:
उत्तर प्रदेश: ₹860.03 करोड़
पश्चिम बंगाल: ₹5,753.11 करोड़ (सबसे ज्यादा)
राजस्थान: ₹651.98 करोड़
पेंशन योजनाओं में भी कई राज्यों के पास बड़ी राशि बची हुई है।
असली सवाल क्या है?
नाम बदलने की राजनीति अपनी जगह है। लेकिन जमीनी सवाल यह है कि क्या मजदूरों को समय पर भुगतान मिलेगा?
मनरेगा में मजदूरी का 100% खर्च केंद्र उठाता है, जबकि सामग्री में 75% केंद्र और 25% राज्य का हिस्सा होता है। अगर केंद्र से फंड में देरी होती है तो सीधा असर गांव के मजदूर पर पड़ता है।
एमपी की तस्वीर दो रंगों में दिखती है-
एक तरफ आवास और सड़क में ‘जीरो बैलेंस’ की उपलब्धि।
दूसरी तरफ मनरेगा में 704 करोड़ की देनदारी।
अब नजर इस बात पर है कि केंद्र सरकार कब तक अतिरिक्त फंड जारी करती है। क्योंकि कागज पर आंकड़े अच्छे लगते हैं, लेकिन गांव में मजदूरी समय पर मिलना ज्यादा जरूरी है।
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