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19th April 2026

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“मेरे बॉस शहबाज़ हैं, मुनीर नहीं” : ख्वाजा आसिफ का बयान; पाकिस्तान की ‘हाइब्रिड हकीकत’ फिर चर्चा में

News Affair Team

Sat, Feb 21, 2026

इस्लामाबाद.

पाकिस्तान की राजनीति में एक पुराना सवाल बार-बार लौटता है—“हुकूमत कौन चला रहा है?”
और इस बार जवाब आया खुद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री की जुबान से।

Khawaja Asif ने साफ कहा—“फील्ड मार्शल आसिम मुनीर मेरे बॉस नहीं हैं। मेरे बॉस प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ हैं।”

बात सुनने में सीधी है, लेकिन पाकिस्तान के सियासी इतिहास को जानने वाले समझते हैं कि यह बयान कितना भारी है।

सवाल जिसने बहस छेड़ दी

18 फरवरी को France 24 को दिए इंटरव्यू में आसिफ से सीधा सवाल पूछा गया—क्या पाकिस्तान की सरकार असल में फील्ड मार्शल आसिम मुनीर चला रहे हैं?

आसिफ ने माना कि अतीत में सेना ने सीधे शासन संभाला है। उन्होंने कहा—

“पाकिस्तान का एक सिस्टम है। हमारे इतिहास में ऐसे दौर रहे हैं, जब सेना का सरकार पर नियंत्रण रहा। एक समय ऐसा भी था जब सेना ने दखल देकर सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी।”

यानि इतिहास से इनकार नहीं। लेकिन वर्तमान पर उन्होंने रेखा खींच दी—सरकार चुनी हुई है, और प्रधानमंत्री ही सर्वोच्च हैं।

‘हाइब्रिड मॉडल’ की कहानी

हालांकि यही ख्वाजा आसिफ पिछले साल एक इंटरव्यू में कह चुके हैं कि पाकिस्तान “हाइब्रिड मॉडल” से चल रहा है—जहां सरकार और सेना मिलकर देश चलाते हैं।

उन्होंने इसे आदर्श लोकतंत्र नहीं, लेकिन “जरूरी” बताया था। यहां तक कहा था कि यह मॉडल आर्थिक और प्रशासनिक समस्याओं को हल करने में “कमाल” कर रहा है।

अब जब वही नेता कह रहे हैं कि “मुनीर मेरे बॉस नहीं”, तो सवाल उठना लाजिमी है—क्या बदला?

आसिम मुनीर: पाकिस्तान के सबसे ताकतवर शख्स?

Asim Munir आज पाकिस्तान के सबसे प्रभावशाली सैन्य अधिकारी माने जाते हैं।

4 दिसंबर 2025 को उन्हें देश का पहला चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) और साथ ही चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (COAS) नियुक्त किया गया।

दोनों पद एक साथ—और कार्यकाल पांच साल का।

इसके साथ ही उन्हें परमाणु हथियारों की कमान भी मिल गई। यानी रक्षा, रणनीति और परमाणु नियंत्रण—तीनों पर पकड़।

12 नवंबर को संसद ने 27वां संवैधानिक संशोधन पास कर सेना की ताकत बढ़ाई थी। इसी के तहत CDF का पद बना।

अब ऐसे में जब रक्षा मंत्री कहते हैं कि “वे मेरे बॉस नहीं”, तो बयान जितना सीधा है, संदर्भ उतना जटिल।

भारत और अफगानिस्तान पर प्रॉक्सी वॉर का आरोप

इंटरव्यू में आसिफ ने एक और बड़ा आरोप लगाया—भारत और अफगानिस्तान की तालिबान सरकार पाकिस्तान के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर चला रही हैं।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान पर हमलों को लेकर नई दिल्ली और काबुल की सोच एक जैसी है।

जरूरत पड़ी तो पाकिस्तान अफगानिस्तान में दोबारा कार्रवाई कर सकता है।

भारत के साथ युद्ध की संभावना भी उन्होंने पूरी तरह खारिज नहीं की।

इस्लामाबाद धमाका और काबुल पर उंगली

हाल ही में इस्लामाबाद की एक शिया मस्जिद में आत्मघाती हमला हुआ। 6 फरवरी को नमाज के दौरान हुए इस हमले में 31 लोगों की मौत और 169 लोग घायल हुए।

इस हमले की जिम्मेदारी Islamic State ने ली।

लेकिन आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान में सक्रिय बड़े आतंकी संगठनों की मौजूदगी के लिए काबुल सरकार की “लापरवाही नहीं, बल्कि मिलीभगत” जिम्मेदार है।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान पहले ही आर्थिक संकट, सीमा तनाव और आंतरिक अस्थिरता से जूझ रहा है।

इजराइल पर सख्त रुख

मध्य-पूर्व के सवाल पर भी आसिफ ने स्पष्ट रुख अपनाया।

उन्होंने कहा कि फिलिस्तीनियों को उनका हक मिले बिना इजराइल से रिश्ते सामान्य करने का सवाल ही नहीं उठता।

गाजा में संभावित अंतरराष्ट्रीय शांति मिशन पर उन्होंने कहा—पाकिस्तान की भागीदारी शर्तों पर निर्भर करेगी।

उन्होंने याद दिलाया कि पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में काम करने का लंबा अनुभव है। अगर परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो गाजा में शामिल होना “दो-राष्ट्र समाधान” की दिशा में सकारात्मक कदम हो सकता है।

शहबाज़ बनाम मुनीर? या साथ-साथ?

Shehbaz Sharif की सरकार पहले ही विपक्ष के आरोपों से घिरी रही है कि असली ताकत सेना के पास है।

आसिफ का बयान सरकार की राजनीतिक वैधता मजबूत करने की कोशिश भी हो सकता है।

लेकिन पाकिस्तान के इतिहास को देखें तो 1958 से लेकर 1999 तक कई बार सेना ने सीधे सत्ता संभाली।

जनरल अयूब खान, जनरल जिया-उल-हक और परवेज मुशर्रफ—ये नाम बताते हैं कि सेना और सियासत का रिश्ता वहां हमेशा जटिल रहा है।

आसिम मुनीर: प्रोफाइल एक नजर में

  • जन्म: 1968, रावलपिंडी

  • 1986 में सेना में शामिल

  • 2018 में ISI प्रमुख बने

  • इमरान खान से मतभेद के बाद 8 महीने में हटाए गए

  • नवंबर 2022 में आर्मी चीफ बने

  • मई 2025 में फील्ड मार्शल पदोन्नत

जब वे ISI प्रमुख थे, उसी दौरान फरवरी 2019 में पुलवामा हमला हुआ था।

यानी सुरक्षा और खुफिया तंत्र में उनकी भूमिका पहले से अहम रही है।

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