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19th April 2026

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जिनेवा से पहले तेहरान का संदेश : “पाबंदियां हटाओ, हम बात करेंगे”; परमाणु डील पर नरमी, लेकिन मिसाइल प्रोग्राम ‘रेड लाइन’

News Affair Team

Sun, Feb 15, 2026

वॉशिंगटन डीसी/तेहरान.

मिडिल ईस्ट की राजनीति फिर गर्म है। ईरान ने संकेत दिया है कि वह अमेरिका के साथ परमाणु समझौते पर बातचीत के लिए तैयार है—लेकिन शर्तों के साथ।

ईरान के उप विदेश मंत्री मजीद तख्त-रवांची ने BBC को दिए इंटरव्यू में कहा कि अगर अमेरिका प्रतिबंधों पर चर्चा के लिए तैयार है, तो ईरान भी अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कई मुद्दों पर समझौता करने को तैयार है।

अब अगला दौर जिनेवा में मंगलवार को होना है। लेकिन सवाल वही—क्या इस बार सच में ‘डील’ बनेगी?

बातचीत की टेबल पर क्या है?

ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से खींचतान चल रही है। 2015 की डील के बाद उम्मीद जगी थी, लेकिन फिर हालात बदले और समझौता ठंडे बस्ते में चला गया।

अब ईरान कह रहा है कि वह 60% तक समृद्ध (enriched) यूरेनियम के स्तर को घटाने का प्रस्ताव दे चुका है। 60% संवर्धन हथियार-ग्रेड के करीब माना जाता है, इसलिए दुनिया को शक है कि ईरान परमाणु हथियार की ओर बढ़ रहा है। हालांकि तेहरान लगातार इनकार करता रहा है।

तख्त-रवांची ने कहा, “हम परमाणु मुद्दे पर बात करेंगे, लेकिन शर्त यह है कि प्रतिबंधों पर भी चर्चा हो।”

यह साफ नहीं है कि ईरान पूरी तरह प्रतिबंध हटाने की मांग कर रहा है या आंशिक राहत से भी काम चल जाएगा।

400 किलो यूरेनियम और रूस का ऑफर

ईरान के पास इस समय 400 किलो से ज्यादा उच्च स्तर पर समृद्ध यूरेनियम का भंडार है। 2015 के समझौते के दौरान उसने अपना स्टॉक रूस भेजा था।

इस बार क्या वह ऐसा करेगा? इस पर तख्त-रवांची ने कहा कि अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी।

रूस ने एक बार फिर यह सामग्री स्वीकार करने की पेशकश की है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक तेहरान अस्थायी रूप से यूरेनियम संवर्धन रोकने का प्रस्ताव भी दे चुका है।

लेकिन मिसाइल पर ‘नो टॉक’

यहां से कहानी में ट्विस्ट आता है।

ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अपने बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम पर कोई बातचीत नहीं करेगा। यह अमेरिका और इजराइल की प्रमुख मांग रही है।

तख्त-रवांची ने कहा, “जब हम पर इजराइल और अमेरिका ने हमला किया, तो हमारी मिसाइलों ने हमारी रक्षा की। हम अपनी रक्षात्मक क्षमता से खुद को कैसे वंचित कर सकते हैं?”

ईरान के लिए मिसाइल प्रोग्राम ‘रेड लाइन’ है। उसका तर्क है कि यह रक्षा के लिए जरूरी है, न कि आक्रामकता के लिए।

अमेरिका की तरफ से क्या संकेत?

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प समझौता चाहते हैं, लेकिन ईरान के साथ डील करना बहुत मुश्किल है।

ट्रम्प ने चेतावनी भी दी है कि अगर परमाणु कार्यक्रम सीमित करने पर समझौता नहीं हुआ, तो सैन्य कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।

अमेरिका का आरोप है कि वार्ता में प्रगति रुकने की वजह ईरान है। साथ ही अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है।

4 शर्तें जो अमेरिका ने रखीं

अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने जिन शर्तों का जिक्र किया, वे इस प्रकार हैं:

  1. यूरेनियम एनरिचमेंट पर पूर्ण प्रतिबंध

  2. पहले से संवर्धित यूरेनियम हटाना

  3. लंबी दूरी की मिसाइलों की संख्या सीमित करना

  4. क्षेत्रीय प्रॉक्सी बलों को समर्थन बंद करना

ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि मिसाइल और क्षेत्रीय प्रभाव उसके लिए बातचीत का हिस्सा नहीं हैं।

“डराकर कुछ नहीं होगा”

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पहले ही कह दिया था कि यूरेनियम संवर्धन किसी भी हाल में नहीं छोड़ा जाएगा।

उनका कहना है कि सैन्य धमकियां या नए प्रतिबंध ईरान की नीति नहीं बदल सकते।

तख्त-रवांची ने भी कहा कि अगर ईरान के अस्तित्व को खतरा हुआ, तो जवाब दिया जाएगा।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य तैनाती हालात को और जटिल बना सकती है।

मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ताकत का प्रदर्शन

अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है। वह अपना सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर USS जेराल्ड आर. फोर्ड क्षेत्र में भेज रहा है।

यह न्यूक्लियर-पावर्ड कैरियर है और एक हफ्ते में तैनात हो सकता है। पहले से USS अब्राहम लिंकन और अन्य युद्धपोत क्षेत्र में मौजूद हैं।

साथ ही गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर, फाइटर जेट और निगरानी विमान भी तैनात किए गए हैं। संदेश साफ है - बातचीत भी होगी और दबाव भी रहेगा।

इजराइल फैक्टर

ईरान को लगता है कि इजराइल इस वार्ता को पटरी से उतारना चाहता है। जून 2025 में इजराइल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले किए थे।

ईरान का दावा है कि उसकी मिसाइलों ने तब रक्षा की थी। इसलिए वह मिसाइल प्रोग्राम को छोड़ने के सवाल पर अडिग है।

जिनेवा में क्या होगा?

अब नजर जिनेवा की बैठक पर है। ईरान उम्मीद के साथ जा रहा है, लेकिन अपनी शर्तों पर। अमेरिका दबाव और चेतावनी दोनों का इस्तेमाल कर रहा है।

सवाल कई हैं-

  • क्या प्रतिबंधों में राहत मिलेगी?

  • क्या ईरान यूरेनियम का स्तर घटाएगा?

  • क्या मिसाइल मुद्दा बातचीत से बाहर रहेगा?

या फिर एक और मौका इतिहास के पन्नों में ‘लगभग हुआ था’ बनकर रह जाएगा?

फिलहाल दुनिया की निगाहें जिनेवा पर हैं। क्योंकि अगर बातचीत विफल हुई, तो मिडिल ईस्ट में तनाव एक नए मोड़ पर जा सकता है। और अगर डील बन गई, तो यह आने वाले वर्षों की वैश्विक राजनीति को बदल सकती है।

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