हर भारतीय पर 4.8 लाख रुपये का कर्ज : RBI 2025 रिपोर्ट-2 साल में 23% की बढ़ोतरी; पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड की देनदारी सबसे ज्यादा
admin
Tue, Jul 1, 2025
नई दिल्ली.
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की ताज़ा फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट के अनुसार, भारत के हर नागरिक पर औसतन 4.8 लाख रुपये का कर्ज है, जो मार्च 2023 में 3.9 लाख रुपये था। यानी, केवल दो वर्षों में प्रति व्यक्ति कर्ज में 90,000 रुपये की वृद्धि हुई है, जो कि 23% की बढ़ोतरी दर्शाता है।
यह कर्जभार देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के मुकाबले भी उल्लेखनीय है। वर्तमान में यह GDP का 42% है, जो वैश्विक औसत से कुछ कम है, लेकिन चिंता का विषय बना हुआ है।
घरेलू कर्ज का बढ़ता ग्राफ
रिपोर्ट के अनुसार, कर्ज के इस आंकड़े में होम लोन, पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड बकाया और अन्य खुदरा ऋण शामिल हैं।
सबसे तेज़ वृद्धि नॉन-हाउसिंग रिटेल लोन — जैसे कि पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड देनदारी — में देखी गई है, जो कि कुल घरेलू कर्ज का 54.9% है। ये ऋण देश की डिस्पोजेबल इनकम का 25.7% बन चुके हैं।
वहीं, हाउसिंग लोन का हिस्सा 29% है, जिसमें ज़्यादातर लोग वो हैं जो पहले से किसी ऋण के बोझ में हैं और दोबारा उधारी ले रहे हैं।
उभरती अर्थव्यवस्थाओं से बेहतर स्थिति
हालांकि, रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि भारत की ऋण-से-GDP अनुपात अभी भी अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं (EMEs) की तुलना में कम है, जहां यह औसतन 46.6% है।
RBI का मानना है कि वर्तमान स्थिति में कोई बड़ा वित्तीय खतरा नहीं है क्योंकि अधिकतर कर्जदारों की क्रेडिट रेटिंग अच्छी है और वे समय पर भुगतान करने में सक्षम हैं।
माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में तनाव के संकेत
जहां एक ओर खुदरा कर्ज का ग्राफ ऊपर चढ़ रहा है, वहीं माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में स्ट्रेस्ड एसेट्स की संख्या में बढ़ोतरी देखी जा रही है।
हालांकि कर्ज लेने वालों की औसत देनदारी 11.7% घटी है, लेकिन 2025 की दूसरी छमाही में इस क्षेत्र में ऋण वसूली की चुनौती बढ़ी है।
RBI ने चेताया है कि माइक्रोफाइनेंस कंपनियां उच्च ब्याज दर और मार्जिन वसूल रही हैं, जिससे निम्न आय वर्ग के कर्जदारों के लिए ऋण चुकाना मुश्किल होता जा रहा है।
बढ़ता विदेशी कर्ज भी चिंता का विषय
भारत पर मार्च 2025 तक 736.3 बिलियन डॉलर का बाहरी कर्ज दर्ज किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 10% अधिक है। यह देश के GDP का 19.1% है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा नॉन-फाइनेंशियल कॉर्पोरेशंस (35.5%), बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थानों (27.5%), और सरकारी एजेंसियों (22.9%) का है।
चिंताजनक बात यह है कि इस विदेशी कर्ज का 54.2% हिस्सा अमेरिकी डॉलर में है, जिससे मुद्रा विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का सीधा प्रभाव ऋण भुगतान पर पड़ सकता है।
आम आदमी पर बढ़ते कर्ज का असर
RBI की यह रिपोर्ट संकेत देती है कि लोन लेना पहले से अधिक सरल हो गया है, लेकिन इसके साथ ही आम जनता पर कर्ज का बोझ भी तेज़ी से बढ़ा है।
ऋणदाता संस्थाएं अधिक आक्रामक तरीके से क्रेडिट ऑफर कर रही हैं, जिससे पर्सनल फाइनेंस पर दबाव बढ़ रहा है।
RBI की मौद्रिक नीति अगर ब्याज दरों में कटौती करती है तो इससे कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन माइक्रोफाइनेंस या क्रेडिट कार्ड जैसे उच्च ब्याज वाले कर्जों को लेकर सतर्क रहना जरूरी है।
RBI की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि भारत में कर्ज का स्तर बढ़ रहा है, लेकिन अभी तक यह नियंत्रण में है। हालांकि, असुरक्षित कर्ज, माइक्रोफाइनेंस संस्थाओं की कठोर शर्तें और विदेशी कर्ज का अनुपात दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए चुनौती बन सकते हैं।
सरकार और RBI को चाहिए कि वे कर्जदारों की सुरक्षा और वित्तीय शिक्षा के लिए नीतिगत बदलाव करें ताकि भारत की विकास यात्रा में आम नागरिक कर्ज के बोझ तले न दबें।
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